बाँदनवाड़े का युद्ध – मेवाड़ की आन पर बलिदान
राजस्थान की वीर भूमि…
जहाँ मिट्टी भी शौर्य की कहानी कहती है…
आज हम बात करेंगे बाँदनवाड़े के उस ऐतिहासिक युद्ध की, जहाँ मेवाड़ के सेनापति
रावत महासिंह सारंगदेवोत
ने अपना शीश देकर मेवाड़ की आन बचाई।
📍 युद्ध की पृष्ठभूमि
यह घटना उस समय की है जब
मेवाड़
और
मुगल साम्राज्य
के बीच लगातार संघर्ष चल रहा था।
मुगल सेनापति
रणबाज़ ख़ाँ
ने मेवाड़ की ओर कूच किया। उसका उद्देश्य था मेवाड़ की शक्ति को तोड़ना।
लेकिन उसे नहीं पता था कि सामने रावत महासिंह जैसे रणबांकुरे खड़े हैं।
🔥 प्रण जिसने इतिहास बना दिया
सभा में रावत महासिंह जी ने ऐलान किया —
“रणबाज़ ख़ाँ के जितने कदम मेवाड़ की ओर पड़ेंगे,
उतनी ज़मीन और उतने कुएँ दान कर दूँगा।”
यह केवल वचन नहीं था,
यह मेवाड़ की धरती के सम्मान की शपथ थी।
⚔️ युद्ध का भीषण दृश्य
बाँदनवाड़ा का मैदान रणभूमि बन चुका था।
घोड़ों की टापें… तलवारों की टकराहट…
धरती रक्त से लाल हो चुकी थी।
अंततः दोनों सेनापति आमने-सामने आ गए।
रणबाज़ ख़ाँ ने पूरी ताकत से वार किया —
और रावत महासिंह जी का शीश धड़ से अलग हो गया…
लेकिन अगले ही क्षण…
रावत साहब की तलवार भी चल चुकी थी…
रणबाज़ ख़ाँ का सिर भी उसके धड़ से अलग होकर धरती पर गिर पड़ा।
यह दृश्य इतिहास में अमर हो गया।
🏆 परिणाम
अपने सेनापति के वीरगति पाने के बावजूद
मेवाड़ की सेना रुकी नहीं।
उल्टा, और भी प्रचंड हो उठी।
मुगल सेना पीछे हटने को मजबूर हो गई।
और बाँदनवाड़े का युद्ध
मेवाड़ की विजय के साथ समाप्त हुआ।
🕊️ अमर बलिदान
रावत महासिंह सारंगदेवोत का बलिदान
राजपूती शौर्य का प्रतीक बन गया।
आज भी
बाँदनवाड़ा
की धरती इस गाथा को याद करती है।
लोकगीतों और चारणों की वाणी में
उनका नाम अमर है।
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