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Showing posts from December 30, 2018
सिरोही। खुद को सिकंदर-ए-सानी यानि दूसरा सिकंदर कहने वाला अलाउद्दीन खिलजी राजस्थान में अब तक चित्तोड को तबाह करने के लिए ही जाना जाता है, लेकिन इसी खिलजी को सिरोही रियासत के महाराव ने अपनी प्रजा की मदद से एक नहीं दो बार धूल चटाई थी। दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी सिरोही जिले में हर देवझूलनी एकादशी पर उसकी बुरी तरह शिकस्त के लिए याद किया जाता है। इस दिन सिरोही रियासत की जीत और अलाउद्दीन खिलजी की हार का जश्न मनाया जाता है। इसी जीत की खुशी में सिरोही के सारणेश्वर गांव देवउठनी एकादशी को एक दिन के लिए रेबारी समुदाय के हवाले आज भी किया जाता है। सिरोही के पूर्व राजघराने के वंशज और इतिहासकार रघुवीरसिंह देवडा ने बताया कि 1298 ईस्वी सन् में दिल्ली के शक्तिशाली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात के सोलंकी साम्राज्य को समाप्त किया। वहां पर सिद्धपुर स्थित सोलंकी सम्राटों द्वारा निर्मित विशाल रूद्रमाल के शिवालय को ध्वस्त किया। उसके शिवलिंग को निकाल कर खून से लथपथ गाय के चमडे में लपेटकर, जंजीरो से बान्धकर हाथी के पैर के पीछे घसीटता हुआ दिल्ली की ओर अग्रसर हुआ। जब खिलजी की सेना शिवलिंग को इसी ...
राजा मानसिंह आमेर" भूमिका- देवीसिंह महार साहब  सनातन धर्म रक्षार्थ राजा मानसिंह आमेर अकबर के साथ बने रहे क्योंकि क्षीण हो चुकी राजपूत शक्ति को पुन: मजबूत करना था और इसके साथ भारत का इस्लामीकरण ना हो इसके लिये यह आवश्यक था कि पठान व मुगल कभी एक ना हो सके और इस कार्य में मानसिंह आमेर सफल रहे ।। अकबर भी यह जानता था कि बिना मानसिंह आमेर व राजपूत शक्ति के उसका राज्य सुरक्षित नही है अत: दोनों पक्ष अपनी अपनी मजबूरी के कारण एक दुसरे के साथ थे । मानसिंह के बढ़ चूके प्रभाव से मुस्लिम सेनापति व सभी सल्लतनतों के सरदार मानसिंह को इस्लाम का दुश्मन मान चुके थे क्योंकि भारत में जो इस्लामीकरण कि बाढ आनी थी वह राजा मानसिंह के कारण रुक गयी । मानसिंह आमेर के सनातन धर्म रक्षक व इस्लामीकरण में बाधक होने के कारण ही सलीम व मानसिंह आमेर में निरन्तर दुरी बनी यह एक सत्य बात है पिछली पोस्ट में हमने इस पर विस्तार से बताया अब उससे आगे ।। विद्वान लेखक ने जहाँगीरनामा की सत्यता को अस्वीकार करते हुए भी, उसी के तथ्यों को अधिक महत्व दिया है । दूसरी तरफ पिथलपोता की ख्यात को अत्यधिक महत्व दिया गया है, जबकि ...

क्षत्रिय_कभी_नहीं_हारे

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#क्षत्रिय_कभी_नहीं_हारे   , हमेशा विजयी हुए है ।कृपया ध्यान से पुरा पढ़े एंव इसे शेयर करे मुस्लिम इतिहासकार ऐसा लिखते है कि इस्लाम द्वारा भारत विजय का प्रारंभ मुहम्मद बिन कासिम के 712 AD में सिंध पर आक्रमण से हुआ और महमूद गजनवी के आक्रमणों से स्थापित, तथा मुहम्मद गौरी के द्वारा दिल्ली के प्रथ्वीराज चौहान को 1O92 A.D. में हराने से पूर्ण हुआ ! फिर दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश के सुल्तान और मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान के शासक बताये गए ! यह काफी हद तक सच नहीं हैं सच यह है कि य़ह 600 वर्षोँ तक चलने वाला राजपूत मुस्लिम युद्ध था ! जिसमे अंतिम विजय मराठा साम्राज्य, राजपूत और सिख साम्राज्य के रूप में हुयी और अब सच की विवेचना के लिए इनके बारे में कुछ तथ्य ! मुहम्मद बिन कासिम 712 AD में जब वह सिंध के राजा दाहिर को हराकर आगे बढ़ा उसे गहलोत वंश के राजा कालभोज ने बुरी तरह हराकर वापस भेजा ! अब अगले 250 वर्ष तक मुस्लिम प्रयास तो बहुत हुए पर पीछे धकेल दिए गए इस बीच भारत में राजपूत राज्य ही प्रभावी रहे ! 1000 AD से महमूद गजनवी के कथित सत्रह आक्रमणों में पांच हा...

_अकबर नहीं महाराणा_प्रताप जीता

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इस__इतिहासकार__के__ये__साक्ष्य  / #प्रमाण__सिद्ध__करते__हैं__कि__हल्दीघाटी__का____युद्ध__अकबर__ने__नहीं   अपितू   #__भारत__के__वीर__पुत्र__महाराणा__प्रताप ने  #_जीता था                      कुछ दिनों पहले ही खबर आई थी कि राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित #_हल्दीघाटी__युद्ध मुगल सम्राट #_अकबर ने नहीं बल्कि #_महाराणा__प्रताप ने जीता था।          इसी के मद्देनज़र अब राजस्थान सरकार 16वीं शताब्दी के इतिहास को बदलने की तैयारी में है। राजस्थान सरकार बाकायदा इसकी तैयारी कर चुकी है । क्योंकि अब इसपर गहनता से रिसर्च किया गया है, जिसमें सामने आया है कि अकबर हल्दीघाटी का युद्ध हार गया था, महाराणा प्रताप अपने बेहतरीन युद्ध कौशल से युद्ध जीत गये थे । 1. #_इतिहासकार_का__दावा - अब आपको बता दें कि ये मुद्दा इतिहासकार डॉ। चन्द्रशेखर शर्मा द्वारा लिखी गई एक किताब जिसका नाम ‘राष्ट्र रतन महाराणा प्रताप’ है में लिखे हुए शोधों को आधार बनाकर उठाया गया है।        ये किताब ...

भारत का इतिहास

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आजादी के बाद  भारत का इतिहास लिखने वाले तथाकथित  बुद्धिजीवी इतिहासकार  लिखते हैं कि  भारत पर  आक्रमण करने वाले विदेशी आक्रमणकारी मुट्ठी भर थे|  यदि विदेशी आक्रमणकारी मुट्ठी भर थे, तो विश्व में उनके 56 देश कैसे बन गए?      अफ्रीका महाद्वीप का अधिकांश हिस्सा, संपूर्ण पश्चिम एशिया, मध्य एशिया अधिकांश मुट्ठी भर लोगों ने कब्जा कैसे कर लिया?     यदि यह विदेशी  आक्रमणकारी मुट्ठी भर थे ,तो इन विदेशी मुट्ठी भर आक्रमणकारियों  ने यूरोपीय ईसाई देश स्पेन तक पर कब्जा कैसे कर लिया?      यदि विदेशी आक्रमणकारी मुट्ठी भर थे, तो यूरोपीय ईसाइयों को अपने ईसाई देशों को स्वतंत्र कराने के लिए इन मुठ्ठी भर विदेशी  आक्रमणकारियों से 500 वर्ष युद्ध क्यों करना पड़ा?      सत्यता यह है कि विदेशी आक्रमणकारियों ने हमेशा ही बड़ी भारी संख्या में एकत्रित होकर आक्रमण किया और  पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता के तथाकथित बुद्धिजीवी इतिहासकारों ने क्षत्रियों को इतिहास में अपमानित करने के लिए ही विदेशी आक्रमणकारियों को...

रेगिस्तान का राजा डकैत स्वरूपसिंह भाटी

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डकैत चौर नाम सुनते ही आपके मन मे कुछ अलग सा अनुभव होता होगा लेकिन आज इस पोस्ट के जरिये आपको गर्व महसूस होगा इन डकैत स्वरूपसिंह भाटी के बारे में सुनकर । यह कहानी 90 के दशक की हैं यह कहानी हैं राजस्थान की राजपूत रियासत जैसलमेर की जँहा के लोगो को “उत्तर भाड़ किवाड़ (उत्तर के रक्षक)” की संज्ञा दी जाती हैं पृथ्वी पर सबसे सरलता से उपलब्ध होने वाली चीज पानी हैं यँहा के लोगों ने पानी के लिए संघर्ष किया है इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि वे लोग कितने संघर्षशील रहे होंगे राजस्थान के रेगिस्तान की एक कहावत हैं “खेजड़ी रा छोडा खा न, काल सु भिड़ जावता ओ आपरा ही बडेरा हा” मतलब खेजड़ी वृक्ष के सूखे फल खाकर अकाल में भी जीवित रहते थे वो अपने ही पूर्वज थे रेगिस्तान में चंबल की तरह डाकूओ का डेरा था जैसलमेर का बसिया क्षेत्र डाकूओ का प्रमुख ठिकाना था यह क्षेत्र बॉर्डर के नजदीक था इसी कारण से भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर खुली तस्करी होति थी वहां से सोना,चांदी आदि का अवैध कारोबार चलता था यहाँ के डाकू चंबल से बिलकुल अलग थे चम्बल में डाकू अपने पर हो रहे अत्याचार के कारण बाघी हो जाते थे परंतु यँहा खेती ...