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कछवाह राजवंश की कुलदेवी श्री जमवाय माता

     कछवाह राजवंश की कुलदेवी श्री जमवाय माता आज आपको हम कछवाह राजवंश की कुलदेवी के बारे में बताते है । । अयोध्या राज्य के राजा भगवान श्री रामचन्द्र जी के पुत्र राजा कुश के वंशज कछवाह कहलाते है । जिनका राज्य अयोध्या से चलकर रोहताशगढ ( बिहार ) में रहा , वहा से चलकर इन्होने अपनी राजधानी नरवर ( ग्वालियर राज्य ) में बनाई । नरवर (ग्वालियर ) राज्य के अंतिम राजा दुलहराय जी ने अपनी राजधानी सर्वप्रथम राजस्थान में दौसा राज्य में स्थापित की , दौसा से इन्होने ढूढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था , मॉच ( मॉची ) गॉव के  पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया । कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची ) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा जमवारामगढ में अपना राज्य स्थापित किया । राजा दुलहराय जी के दो पुत्र हुये  कॉकिलदेव और वीकलदेव जिसमें कॉकिलदेव जी ने मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स...

राजपूताना स्टोरी

                    भुली और बिसरी, एक कहानी  जैसा क़िस्सा और इतिहास का हिस्सा.... कीरत रो धाड़ो कियो !! " दियां रा देवल़ चढै" री बात भक्त कवि ईशरदासजी सटीक कैयी है। उणां सही ई कैयो है देवणियो अमर है।राजा कर्ण आपरी वीरता सूं बत्तो दातारगी रै कारण जाणियो जावै- दान के नहर की लहर तो दुरूह देखो, प्रात की पहर तो ठहरगी रवि जाये की।। इणी बात री हामी भरतां कविराजा बांकीदासजी  कैयो कै आज कठै तो आशो डाभी है अर कठै बाघो कोटड़ियो ?पण उणां रे सुजस री सोरम आज ई अखी है। कोटड़ियो बाघो कठै आसो डाभी आज। गवरीजै जस गीतड़ा गया भींतड़ा भाज।। कोई कितरो ई धनवान कै बल़वान होवो पण जितैतक उणरै मन में उदारता कै त्याग नीं है उतैतक बो किणी रै मन में आपरै प्रति अनुराग नीं जगा सकै।लोग तो उणांनै ईज याद करै जिकै धन नै  हाथ रो मैल मानता आया है- अत्थ जिकां दी आपणी, हरख गरीबां हत्थ। गवरीजै जस गीतड़ा , तांत तणक्कां सत्थ। या हेली थारै कंथ रै , मिटै न मंगणियार। जद जागूं जद सांभल़ू, तांत तणी तणकार!! ऐड़ै दातारां री उदारता नै अखी राखण सारू...

मैंने उसकोजब-जब देखा,लोहा देखा।लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा

                        मैंने उसकोजब-जब देखा,लोहा देखा।लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा। #यह_ही_है_क्षत्राणी          यथार्थ में देखा जाए तो क्षत्राणीयों का इतिहास व उनके क्रियाकलाप उतने प्रकाश में नहीं आए जितने क्षत्रियों के। क्षत्राणीयों के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षत्रिय का महान त्याग व तपस्या का इतिहास वास्तव में क्षत्राणीयों की देन है।       राजा हिमवान की पुत्री #गंगा ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाया और भागीरथ की तपस्या से वे इस सृष्टि का कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई। उन्हीं की छोटी बहन #पार्वती ने अपनी तपस्या के बल पर भगवान् सदाशिव को पति के रूप में प्राप्त किया व दुष्टों का दलन करने वाले स्वामी कार्तिकेय और देवताओं में अग्रपूजा के अधिकारी गणेश जैसे पुत्रों की माता बनी। महाराजा गाधि की पुत्री व विश्वामित्र जी की बड़ी बहन #सरस्वती अपनी तपस्या के बल पर ही जलर...

हमारी_भूलें

  कार्य_व_मार्गदर्शन_की_अवास्तविक_मांग आज लोग कहते है – ” हम काम करना चाहते हैं, लेकिन हमको कोई काम देने वाला नहीं है । हम सामजिक व आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में मार्गदर्शन के लिए तड़प रहे है लेकिन हमको कोई मार्गदर्शन देने वाला नहीं है। ” यह दोनों की मांगे पूरी तरह से असत्य व अपने आप को धोके में डालने वाली है। जो कार्य करना चाहता है , उसको काम करने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती और जो मार्ग को खोजना चाहता है , उसे मार्ग को प्राप्त करने से कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती। काम की मांग करना अपनी निष्क्रिय पे पर्दा डाल कर अपने आप को भ्रमित करना है । लोग कहते है कि हम श्री क्षत्रिय युवक संघ में काम करना चाहते है । हम काम तब करें , जब हमको कोई अधिकृत व्यक्ति काम करने के लिए कहे । अगर हम वास्तविकता में जाएँ तो यह कथन कतई सही नहीं है , क्योंकि इस कथन के साथ भी दुराग्रह जुड़े हुए है । क्षत्रिय युवक संघ कोनसा है ? इसकी परिभाषा भी हम करें। उस प्रकार से हो तो हमें स्वीकार है अन्यथा नहीं । काम क्या हो व कैसा हो ? यह भी हम कहें जैसे तो तो ठीक है है अन्यथा गलत। फिर काम व मार्गदर्शन कि मांग ...

कच्छावाहा राजवंश

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                       कच्छावाहा राजवंश                         राजपूत-कच्छवाहा-सूर्यवंश-कुम्भावत शाखा। आमेर के राजा चन्द्रसेन बनबीरोत के पुत्र कुम्भा अपने समय के ख्याति प्राप्त वीर योद्धा एवं पराक्रमी थे। हिन्दाल पठान के द्रारा रायमल जी अमरसर पर वि.स.1555 मै कुम्भा जी ने अत्यत विरता दिखाते हुऐ। विरगति को प्राप्त हुऐ। इन्हि के वंशज कुम्भावत कहे लाऐ। कुम्भा जी के पुत्र उदयकर्ण को महार की जागीरी मिली।  इनके वंशज लुर्णकर्ण जी भी तजस्वी व प्रतापी थें। उनको रावत की विषश पदवी दी गई। इस कारण लुर्णकर्ण जी के रावत भी कहलाऐ।  लुर्णकर्ण जी के चार  पुत्र रामजी कर्मसिह जी(3व4के नाम ज्ञात नहीं) बडे पोत्र राम जी महार रहे छोटे कर्मसिह जी पाड़ली ठीकाना मिला। बाद मै छुट गया। ओर उनके वंशजो को दातंली ठिकाना मिला।(मेहन्दीपुर के बालाजी के नजदीक ) दौसा  तीसरे पोत्र के वंशज झुन्झुनू जिला मे बाजवा,हरिडिया,लामा ढाडी, टिलोडी मे आज भी निवास.करते है।  ये राव...

रत्नावत कछ्वाहा

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                         रत्नावत कछ्वाहा राजपूत +-सूर्य वंश-शाखा -रत्नावत कछ्वाहा। रत्नावत - दासासिहं (दासाजी) के पुत्र रतनसिहं के वंशज रत्नावत कहलाऐ। दासाजी,नरूजी क पुत्र थे, हां हुक्म वही नरूजी जिन्है से नरूका वंश चले रहा है।  हम यू भी कहै सकते है।की रत्नावत नरूका कछवाहा की उप शाखा है। प्राचिन अलवर राज्य(  वर्तमान मै राजस्थान का जिला है।) मे रत्नावतो के पांच मुख्य ठिकाने थे। 1.मेहरू - वर्तमान भारत के राजस्थान के टोक जिले में है। 2. निमेडा़-वर्तमान भारत के राजस्थान में जयपुर जिले के फागीं तहसील में है। 3.खेर-वर्तमान भारत में राजस्थान के अलवर जिले में है। 4.तिराजू-वर्तमान भारत के राजस्थान के टोक जिले में है। 5.केरवालिया-वर्तमान में भारत राजस्थान के बाराँ जिले मे है। रत्नावत कछवाहा नरूका कछवाहा की ही उपशाखा है। महाराज मेहराज जी,   (मिराजजी) के वंशज नरूजी के वशंज नरूका कहलाऐ।मेराज जी बरसिहं जी के पुत्र ओर उदयक्रण जी के पोते है। नरूजी के पोत्र दासासिहं (दासाजी) दासाजी के  पुत्र रतनज...

भूत

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            रणसी गांव की भूत बावड़ी का किस्सा चाम्पावत ठाकुर सा ने भूत को वश में कर बनवाई थी बावड़ी और महल जोधपुर से करीब 105 किलोमीटर दूर बोरूंदा थाना क्षेत्र में एक एेतिहासिक गांव है रणसी गांव... यहीं मौजूद है ये भूत बावड़ी। ये बावड़ी कलात्मकता का एक बेजोड़ नमूना है।जिसे खुद भूत ने बनाया था! जोधपुर दरबार के यहां रणसी गांव के ठाकुर जयसिंह चाम्पावत ठकुराई का काम देखते थे। एक दिन ठाकुर सा गणगौर मेले में जोधपुर के राजा के किसी काम के लिए जा रहे थे। रास्ते में चिडाणी गांव स्थित लत्याळी नाडी में वे अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए रुके। उस समय रात काफी हो चुकी थी। ठाकुर सा का घोड़ा जब पानी पी रहा था, तभी ठाकुर सा को वहां एक झाड़ी के पीछे कुछ हलचल महसूस हुई। गौर से देखने पर ठाकुर सा को वह कोई भूतहा आकृति मालूम हुई। ठाकुर सा के बड़ी निर्भीकता से बोलने पर भूत उनके सामने प्रकट हुआ और बोला कि मैं एक शाप से बंधा हूं और इस नाडी का पानी नहीं पी सकता, आप मुझे पानी पिला दीजिए। पानी पीने के बाद उस भूत ने ठाकुर जयसिंह से कुछ खाने की सामग्री भी मांगी, जिसे लेने के बाद...